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समाज के लिए आदर्श नायिका हैं वीरांगना लक्ष्मीबाई

समाज के लिए आदर्श नायिका हैं वीरांगना लक्ष्मीबाई

समाज के लिए आदर्श नायिका हैं वीरांगना लक्ष्मीबाई

भारत भूमि पर अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अनेक वीर अग्रणी भूमिका में रहे हैं। लेकिन देश को स्वतंत्र कराने में मातृशक्ति का योगदान किसी प्रकार से कम नहीं कहा जा सकता है। जिन नारियों ने भारत को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई आज पूरा देश उन्हें वीरांगना के नाम से स्वीकार करता है। वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मनोमस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। वर्तमान युग में जहां हर कोई अपने आप तक केन्द्रित होता जा रहा है, उनके लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई का जीवन एक ऐसा उदाहरण है, जो राष्ट्रीय भावना को संचारित करने में एक आदर्श है। भारतीय नारी शक्ति को इस बात का अवश्य ही विचार करना चाहिए कि हमारे नायक कौन होने चाहिए? क्योंकि श्रेष्ठ नायक और नायिकाओं के माध्यम से ही श्रेष्ठ जीवन बनता है। आज हम जिस चमक दमक में नायकत्व को देखने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में भारत के नायक हैं ही नहीं। इसे सुनियोजित तरीके से भारत में इस रूप में प्रचारित किया गया है और इसी कारण समाज का बहुत बड़ा वर्ग भ्रम में जी रहा है।

यह वास्तविकता ही है कि जो भी देश से प्यार करता है, उसे कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से डिगा नहीं सकता। ऐसे ही महान व्यक्ति भविष्य में समाज के नायक के रूप में स्थापित होते हैं। वास्तव में नायक वही होता है, जो अपने कर्मों से सही राह पर चलने की प्रेरणा दे सके। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। उसे अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म भाव को प्रदर्शित करने वाला प्यार था। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया। वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोपड़ी को चिता का रूप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

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जिन महापुरुषों और महान नायिकाओं का हृदय वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं। सन् 1850 मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया। 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अंग्रेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं। उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। 

रानी की वीरता और साहस का लोहा अंग्रेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, बानपुर के राजा मर्दन सिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा, लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय के उल्लास का नहीं था, अपनी शक्ति को संगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था। इधर जनरल स्मिथ और मेजर रूल्स अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करते रहे और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने घमासान युद्ध करके ग्वालियर का किला अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंतत: उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की आहुति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और राष्ट्रीय रक्षा के लिए बलिदान का संदेश दिया। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान उस समाज के लिए भी एक प्रेरणा है जो देश के विरोध में नए नए षड्यंत्र करते हैं। क्योंकि विचार करने वाली यह है कि देश को स्वतंत्र कराने के लिए जिन योद्धाओं ने अंग्रेजों से मुकाबला किया, वह उनके स्वयं के लिए नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज के लिए ही था। आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं तो इसमें इन क्रांतिकारियों का अविस्मरणीय योगदान है। भारत की भावी पीढ़ी को ऐसे नायकों से प्रेरणा लेकर जितना भी बन सके, राष्ट्र के लिए योगदान देना ही चाहिए।

- डॉ. वन्दना सेन
(लेखिका पीजीव्ही महाविद्यालय ग्वालियर में हिन्दी की विभागाध्यक्ष हैं)

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