Gyan Ganga: अपना भेद लेने आये व्यक्ति से भी आपत्ति क्यों नहीं जताई थी श्रीराम ने?
भगवान श्रीराम जी ने सुग्रीव को समझाते हुए कहा कि अगर श्रीविभीषण को सच में पापी व कपटी मान भी लिया जाये, तो ऐसा वास्तव में होने में मुझे संदेह प्रतीत हो रहा है। कारण कि पापी का यह सबसे बड़ा गुण होता है, कि उसे मेरा भजन कभी नहीं सुहाता है। वह मेरे दर्शन से सदा कटता ही रहता है। इसलिए मेरा यह दृढ़ भाव से सोचना है, कि अगर विभीषण वास्तव में ही पापी है, तो वह कभी भी मेरे समक्ष उपस्थित होने न आता-
‘पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई।।’
तुम्हें पता है न कि वह मेरी प्राप्ति हेतु ही यहाँ आया है। और मुझे पाने का सर्वप्रथम नियम ही यह है, कि मुझे निर्मल मन वाला ही पा सकता है। कारण कि मुझे कपट, छल व छिद्र नहीं सुहाता है। और फिर अगर वह हमारा भेद लेने आया ही है, तो हे सुग्रीव, इसमें हमें तब भी कुछ भय अथवा हानि नहीं है।
भगवान श्रीराम जी ने कितनी बड़ी बात कह डाली। वे कहते हैं, कि कोई हमारा भेद लेने भी आये, तो हमें भला इसमें क्या आपत्ति? क्योंकि आपत्ति तो हमें तब होनी चाहिए, जब हमने अपना कुछ भेद रखा हो। हमारा जीवन तो एक खुली पुस्तक है। जो भी इस पुस्तक को पढ़ेगा, उसका कल्याण तो निश्चित है। ऐसा नहीं कि संसार के जीवों का जीवन ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन वास्तव में, उनका जीवन ऐसा होता नहीं है। वे अनजाने में ही, माया के आधीन होकर, अपने जीवन को कठिन व उलझा कर रखते हैं। उन्हें लगता है कि अगर हम अपने जीवन का रहस्य खोल देंगे, तो सबको पता चल जायेगा, कि हम इस वृति के हैं। इसका सीधा-सा अर्थ है, कि जीव स्वयं को, बाहर से तो अच्छा ही बना कर प्रस्तुत करता है। लेकिन वास्तव में भीतर से वो ऐसा होता नहीं है। उसे भय होता है, कि कहीं उसका यह भेद किसी को पता न चल जाये। इससे निश्चित ही उसके चरित्र का भंड़ा फूट जायेगा। जो कि उसे पीड़ित करेगा।
यह तो रहा, कि अगर विभीषण मेरा भेद लेने आया है, तो क्या परिणाम हो सकते हैं। दूसरा पहलू यह है, कि हो सकता है, विभीषण मेरा भेद लेने आया ही न हो। वह राक्षसों के भय का मारा भी तो यहाँ आ सकता है? अगर ऐसा है, तो हे सुग्रीव! तुम्हें तो इसका ज्ञान ही है, कि जगत में जितने भी राक्षस हैं, उन्हें श्रीलक्ष्मण जी क्षण भर में ही, मुत्यु के घाट उतार सकते हैं। और यदि विभीषण भयभीत होकर मेरी शरणागत होने आया है, तो उसे मैं प्राणों की भाँति अपने चरणों में रखूँगा-
‘जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं।।’
श्रीराम जी के यह वाक्य श्रवण कर, सुग्रीव के समस्त मानसिक संशय समाप्त हो चले। और वे श्रीहनुमान जी एवं श्री अंगद जी को साथ लेकर, श्रीविभीषण जी को लेने चले। आगे के दृश्य में, श्रीराम जी एवं श्रीविभीषण जी के मध्य कैसी सुंदर वार्ता होती है, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।
- सुखी भारती
Why did not shriram object even to the person who came to take his secret